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उपनिषद ऋषियों का वचन

22 August

उपनिषद ऋषियों का वचन है -

 आहार शुद्धि से प्राणों के सत की शुद्धि होती है, सत्व शुद्धि
 से स्मृति निर्मल और स्थिरमति (जिसे प्रज्ञा कहते हैं) प्राप्त होती है, स्थिर बुद्धि से जन्म-जन्मान्तर
के बन्धनों और ग्रन्थियों का नाश होता है और बन्धनों और ग्रन्थियों से मुक्ति ही मोक्ष है और बन्धनों
 और ग्रन्थियों से मुक्ति ही मोक्ष है। अतः आहार शुद्धि प्रथम नियम और प्रतिबद्धता है।
आहार केवल मात्र वही नहीं जो मुख से लिया जाए, आहार का अभिप्राय है स्थूल शरीर
और सूक्ष्म शरीर को पुष्ट और स्वस्थ रखने के लिए इस दुनिया से जो खाद्य लिया जाए।
  1. कान के लिए आहार है शब्द त्वचा के लिए आहार है स्पर्श
  2. नेत्रों के लिए आहार है दृश्य या रूप जगत
  3. नाक के लिए आहार है गन्ध
  4. ऽ कुछ कर्णप्रिय ध्वनि संगीत या बातचीत के रूप में हितकारी है,
  • ऽ कुछ दृश्य सुखद होते हैं कुछ असुखद, सुखद दृश्यों को देखें।
  • ऽ कुछ रूचिकारक सुगन्ध हैं कुछ अरूचिकारक दुर्गन्ध है, उन दुर्गन्धों से दूर रहें।
  • कुछ ध्वनि शोर में बदल जाती है, इसे तिरस्कृत करें।
  • ऽ कुछ स्पर्श
अतः ज्ञानेन्द्रियों के जो पाँच दोष हैं जिससे चेतना में विकार पैदा होता है उनसे बचें।
महोदय, साधक को त्याग करने को नहीं कहा जा रहा है,
कि तुम्हे सम्पति का त्याग करना होगा
कि आसक्तियों का त्याग करना होगा
कि कामनाओं का त्याग करना होगा परन्तु इस साधना के पथ पर तुम्हे किसी चीज का
त्याग करने की आवश्यकता पर बल नहीं देना है, या कहें -
जब तक तुम्हे किसी चीज का त्याग करने की आवश्यकता है तब तक तुम इस पथ पर नहीं आये हो।
क्योंकि त्याग करने का अर्थ है कि तुम्हें कोई ऐसी चीज या वस्तु छोड़नी है, जिसे तुम मूल्यवान
 समझते हो, तुम्हे किसी ऐसी चीज को विदाई देनी पड़ती है जिसे तुम रखने योग्य समझते हो।
पर तुम जिसे प्राणों से अधिक चाह रहे हो, वह कुरूप और असह्य दुःख क्लेश से पूर्ण है और एक
 बार जब तुम इसे दुःख रूप में अनुभव करोगे, तो समस्त चेतना उत्कंठ रूप में कहेंगी -
मुझे कोई दूसरी वस्तु चाहिए - ऐसी जो सत्य, सुन्दर और शिवमय हो,
 वह ज्ञान आनन्द और चेतना से परिपूर्ण हो।
तब कुछ त्याग करना न होगा -
सत्य चेतना स्वतः प्रकट होकर सार्थक और निरर्थक का बोध करा देगी।
सार्थक संग चलेगा
और निरर्थक वही पीछे छूट जायेगा।
  • साधना का अर्थ है – किसी भी मन्त्र आसन आदि का बारम्बार अभ्यास करना।
  • तपस्या का अर्थ है – साधना का फल पाने के लिए संकल्प शक्ति को एकाग्र करना।
  • आराधना का अर्थ है – भगवान की पूजा करना, उन्हें प्रेम करना, उनकी अभिप्सा करना।
  • ध्यान का अर्थ है – चेतना का अन्तस में केन्द्रीभूत हो जाना, बाह्य यात्र को छोड़कर अन्तर्यात्रा का आरम्भ हो जाना।
  • ध्यान साधना का एक समय नियत कर लें और जहाँ तक सम्भव हो, ठीक उसी क्षण या समय पर आरम्भ करें।
प्रारम्भ में कम से कम 15 मिनट तक अभ्यास करें। यदि सम्भव हो तो प्रातः सायं
 दोनों समय ध्यान करें। जहाँ तक सम्भव हो, खाली पेट निराहार ध्यान साधना
 करें या हल्के तरल पेय पी सकते हैं।
	सिद्धों ने रहस्यमयी भाषा का प्रयोग किया है। उन्होंने कहा ध्यान का तात्पर्य है
 डूबना और मात्र डूबना नहीं, डूबकर पार हो जाना।
	गंगा (इडा नाड़ी) को कहा यमुना (पिंगला नाड़ी) को कहा गया है और इन दोनों
 नाड़ियों के शुद्ध होने के पश्चात् साधक जब सुषुम्ना को साध लेता है तो उसे सिद्धों ने सरस्वती कहा है।
	गंगा यमुना में डूबकर ही सरस्वती को साधने का रहस्यमय बोध, सिद्ध कराते कराते
 हैं अर्थात् दाई नाक से आने वाले श्वास और बाई नाक से आने वाले श्वास का बोध और उनका
 नियन्त्रण ही ध्यान में डूबना है। सुषुम्ना का जागरण ही डूबकर पार हो जाना है।
ऊँ तद् विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः। दिवीव चक्षुराततम्।
	ध्यान के लिए श्रम करो। स्वामी सत्यानन्द कहते थे, तीव्र कर्म करो जिससे देह मन  की कलुषता समाप्त हो सके।
अन्तःकरण में मन, बुद्धि, चित्त और अंहकार चारों हैं। अतः इन चारों की साधना पद्धतियाँ हैं।
 मन्त्र की साधना मन्त्र से, बुद्धि की ज्ञान योग, चित्त की ध्यान से और अहंकार की राजयोग से साधना करनी चाहिए।
	ध्यान की पहले चरण में शरीर की अतिरिक्त ऊर्जा हटाने के लिए उछलें, कूदें, भागे। जिस भी पशु जैसी बोली बोल सकते हो, बोलें।
	कुछ देर शान्त रहें।
	फिर विपश्यना अभ्यास करें। विपश्यना का अर्थ है अन्दर देखना।
	सिद्धों ने शुद्ध चैतन्य की उपमा हंस से दी है। आध्यात्मिक उन्नति में श्ुाद्ध प्रबुद्ध चेतना,
 साधना से जैसे-जैसे निखरती है, साधक जीवन में अन्तर्मन की सरलता और सरसता को वैसे ही
महसूस करता है। इसी कारण आध्यात्मिक उन्नति के शिखर पर बैठे सिद्ध परमहंस कहलाते हैं।

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