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ज्योतिष Jyotish

09 September

Jyotish ज्योतिष

ज्योतिष वेदांग है, उपवेद है। परम्परा में ज्योतिष के अन्तर्गत काल तत्व का अध्ययन किया जाता है जिसका मूल कारण जगत में होने वाले सभी परिवर्तन काल सापेक्ष है अतः परिवर्तमन को जानने के लिए काल (समय) को मुख्य आधार माना जाता है। संसार में होने वाली घटना किसी न किसी समय में होती है।

ज्योतिष शास्त्र को मुख्यतः भाग्यवादी माना जाता है परन्तु किसी भी व्यक्ति के सौभाग्य-दुर्भाग्य को ज्योतिष से जोडना मूलतः गलत है। ज्योतिष मूलतः कर्मवाद है, पुरूषार्थ का विश्लेषण है और हमारे सुख-दुख के मूल कारण भी हमारे कर्म ही हैं हमारे पुरूषार्थ ही हैं। वही पुरूषार्थ अपने सहकारी कारणों के साथ फल देता है अतः ज्योतिष कर्म तथा पुरूषार्थ की काल (समय) परक व्याख्या है। भारतीय षडदर्शन में सांख्य दर्शन तथा वैशेषिक दर्शन भारतीय ज्योतिष के आधार पर बल है। कार्य कारण का सिद्धान्त जिसमें कारण पहले होता है उसके पश्चात् कार्य होता है। इसी का विश्लेषण और वर्गीकरण ज्योतिष अनुसार फलित कथन में होता है इसे ही व्यवहार में आवश्यकता ही आविष्कार की जननी होती है कहा गया है।

भारत में ज्ञान की परम्पराएँ समृद्ध रही है। इसी कारण से अन्य दर्शन शास्त्र की शाखा पुष्प पल्लवित होती रही है।

1. आश्चर्य,

2. संशय,

3. वर्तमान परिस्थिति से असन्तोष,

4. ज्ञान की तीव्र पिपास,

यह किसी विषय को जानने के चार स्तम्भ है।

यह चार स्तम्भ ही किसी घटना के कब, क्यों और कैसे घटने की जानकारी देते हैं प्रकृति अपने गुणों के अनुसार कार्य करती है वह तीन गुण हैं- सत, रज और तम! अब किसमें कार्य करती है वह 24 तत्व हैं-

पंच महाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आक्षश)

पंच तन्मात्राएँ (शब्द, स्पर्श, रूप, रस गन्ध)

पंच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, नाक, कान, त्वचा, रसना)

पंच कर्मेन्द्रियाँ (हाथ, पैर, जिह्वा)

चतुष्टम अन्तकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार)

यह 24 तत्व प्रकृति के गुणों के अनुसार कार्य करते हैं। जब यह सात्विक कार्य करते हैं तो समाज और उसकी व्यवस्था को उत्कृष्ट बनाकर रचनात्मक कार्य करते हैं। जब यह तामसिक व्यवहार करते हैं तो समाज और उसकी व्यवस्था को निकृष्ट बना विध्वंसात्मक हानि पहुँचाते हैं।

इस जगत में ज्ञात या अज्ञात कुछ भी नहीं है। जो आज ज्ञात है वह कल अज्ञात हो जायेगा, जो कल अज्ञात था आज ज्ञात है। संसार की गति चक्रवत है इसका न कोई प्रारम्भ बिन्दू है न समापन। प्रकृति अपना कार्य इतने व्यवस्थित और सुसंगत रूप से कर रही है कि हम तो उसके क्रिया-कलापों और परिणामों को मात्र देख रहे हैं।

कालात्मा सूर्य को केन्द्र मानकर हम दिनो और वर्षों की गणना करते हैं जबकि काल एक अखण्ड और अविभाज्य सत्ता है तथा दिन और वर्ष हमारे समाज और व्यवस्था की मान्यता।

समय के कल्पित आवरण के नीचे जो रहस्य स्थित है, उसे जानने की इच्छा सबको रहती है। हमारे ऋषियों ने मानव की इस सहज जिज्ञासा को समझकर ही ज्योतिष जैसे ज्ञान को शास्त्रीय स्वरूप दिया। वही ज्ञान सतत प्रवाहशील होकर आज समाज कल्याण हेतु बना है।

ज्योतिष सामाजिक साहचर्य के सिद्धान्त का पोषण करता है। वह व्यक्ति को समाज से अलग नहीं वरन् समाज में एक स्थान देता है। उसके अनुरूप ही व्यक्ति का व्यक्तित्व, स्वभाव, प्रकृति, रूप, वर्ण, आयु, कार्य-व्यवसाय, जीवन के सुख और आनन्द, रोग, दुख, मृत्यु का निर्धारण करता है।

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