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ध्यान क्यों करें? कैसे करे? और कब करें?

14 February

आधुनिक समाज में व्यस्ततम् व्यक्ति ध्यान क्यों करें? कैसे करे? और कब करें?

यही जानना चाहता है। ध्यान का उपयोग क्या हैं? क्या ध्यान विचार शून्यता को उपलब्ध कराता है या मात्र एक बौद्धिक को तूहल बन कर रह जाता है अथवा अशान्त मन को शान्त करने का उपाय मात्र है। यह जिज्ञासा प्रत्येक साधक के अन्तकरण में उठती है। ध्यान का उपयोग विचारों को शान्त करने अथवा अशान्त विचारों का मार्ग अवरूद्ध कराना ही नहीं है जो चित्त को अशान्त करतेे है।

ध्यान एक ऐसे फिल्टर का कार्य भी करता है जो निर्रथक, निरउद्देश्य विचारों को समाप्त कर देने वाले विचारों से साधक के मन को परिपूर्ण कर देता है जिससे ध्यान साधक अपने जीवन में आनन्दित और उत्साहित रहता है। ध्यान साधक के उस विधेयात्मक बोध को जाग्रत करता हे जो उसे जीवन की गहन जटिलताओं से मिलते है। वह बोध रोचक भी है और रहस्यमय भी।
मन को सुव्यवस्थित करने के अनय भी तरीकें या उपाय हो सकते है फिर ध्यान ही क्यों?
मन को ऐसे विचारों से भर दें जो मात्र नैतिक आचरण से प्रेरित हो।
मन को ऐसे विचारों से हटा दें जो पतन की ओर ले जाते हो।
किसी मन्त्र वर्ण अथवा अक्षर की लय या धु्र्रन पर मन को स्थिर कर दे।
यह सभी बातें ठीक है पर आंशिक उस मन रूपी कमरे में कचरा भरा है और हम धूप बत्तीयाँ जला दे, दुनिया के मंहगे बेशकीमति इत्र छिडक दें। कितनी देर उनकी खुशबू ठहर पायेगी। बस इसी कारण से यह उपाय इतना ही महत्व रखते है, इसी लिए अधिकांश व्यक्तियों के लिए महत्वहीन है, नीरस है और निरर्थक है।
ध्यान निर्विशयं मनः। ध्यान मन की निविषयता है और मन के निविषय रहने का अर्थ मन का न रहना उन्मना हो जाना, अनमना हो जाना है।
नां नहीं मन का होन। ना मन का होना।
मन का उन्मना होने है अतीत और भविष्य की चिन्ताओं से मुक्त होना। अतीत और भविष्य से मुक्त व्यक्ति ही वर्तमान क्षण का आनन्द ले सकता है। अतः जो वर्तमान है उसे जियो।
मन या भविष्य में जीता है या अतीत में। जीवन को सहज स्वीकार ले क्योंकि जो सहज स्वीकार लेता है जीवन को बस वही वर्तमान क्षण में जी सकता है।

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