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ध्यान धारणा के बिन्दू

14 February

धारणा के बिन्दू

  • रंगीन मयूर पंख को मन सम्मुख रख कर या कल्पना करें एक मोर के बिन्दू और ध्यान को वही सुस्थिर कर दें।
  • ध्यान करे की बासुँरी सम्मुख है और उससे मन्द स्वर फूट रहे है।
  • अब संयुक्त ध्यान करे कि बाँसुरी पर मोर पंख बँधा है, तो मधुर ध्वनि भी है और मोर पंख का रूप भी दोनों पर संयुक्त ध्यान करें।
  • ध्यान करें आप खुले आकाश के नीचे पदमासन या सुखासन में बैठे हे और हल्की-हल्की फुहारे आप के ऊपर पड़ रही है। चित्त में एक अपूर्व विश्रान्ति का अनुभव हो रहा है।
  • ध्यान करें कि एक सतरंगी इन्द्रधनुष आपके सम्मुख है, मन्द शीतल पवन बह रही है, धीरे धीरे वह इन्द्र धनुष आपके चारों और साधना से विरल होकर व्याप्त होता जा रहा है उस इन्द्र धनुष के प्रत्येक हरे नीले, बैंगनी, पीले रंग का अनुभव करें।
  • ध्यान करें होली का पर्व हे सुगन्धित, शीतल खुशबुदार रंग धीरे-धीरे आपकी देह को भिगो रहे है। सुगन्धित गुलाब आपके ऊपर डाले जा रहे है आत्मा इस पवित्रता का बोध कर रही है।
  • ध्यान करे एक स्वच्छ निर्मल नीला आकाश , वह आकाश जिसकी कोई आकृति नहीं, पर उसकी सत्ता है उसी शून्यस्वभाव, उपाधि रहित व्योम को निहारे और अनूभूति करे वह आकाश हमें चारों और से व्याप्त कर रहा है। इससे परमात्मा के साथ होने का बोध होता है।
  • ध्यान करे एक कमल का पुष्प आपके सामने है वह एक सुन्दर सरोवर में खिल रहा है वह पुष्प धीरे-धीरे विकसित हो रहा है, पखुडियाँ धीरे-धीरे खिल रही है सुन्दर सुवास उससे आ रही है वह पद्म राग आपकी देह को सुवासित कर रही है।
  • ध्यान करे एक जल से परिपूर्ण झरना आपके सम्मुख है पानी झर रहा है कुछ बूंदे छिटक रही है, आकाश में जल बूंदों के रूप में उड़ रहा है, बूँद आपके शरीर का स्पर्श करती है रोम-रोम पुलकित है। झरने के बाद जल के बहने का कलकल स्वर सुने।
  • ध्यान करें एक पात्र जल से परिपूर्ण आपके सामने (समक्ष) रखा है जल इतना भरा है कि एक बूँद भी जल पात्र में समा न सकें।
  • ध्यान करें एक दीया आपके सामने प्रकाशयान हो रहा है उसकी लौ स्थिर है वह अपने प्रकाश को चारोें और बिखेर रहा है।
  • ध्यान करें निशब्द रात्रि है, शीतल ब्यार बह रही है तारे आकाश में चमक रहे है।
  • पूर्णिमा का चाँद क्षितिज पर उभर आया है धीरे-धीरे वह आकाश में ऊपर जाकर स्थिर हो रहा है आप उसकी चाँद (चन्द्रमा) की चाँदनी में स्नान कर रहे है।
  • फिर भोर का समय एक शान्त, निस्तरंग झील जिसमें आकाश के तारे प्रतिबिम्ब होते हो आप तारे भी देखे और उनके प्रतिबिम्ब को भी तारे इतने नजदीक कि हाथ बढ़ा के पकड लो।
  • ध्यान करें (कृष्ण पक्ष) अमावस्या की रात में घुप अन्धकार का।
  • यह ध्यान चित्त की बाहय वृत्तियों को तत्काल रोक देताा है और अन्र्तमुखी बना देता है।
  • यह विभक्त चिन्तन को समाप्त कर देता हैं
  • समस्त बोध को विराम देता है। निराश्रय चित्त शक्ति को प्रकट कर देता है और अद्र्वय तत्व की प्रप्ति होती हैं।
  • किसी पर्वत शिखर के नजदीक बैठकर अविकल्प बुद्धि से पर्वत और महा आकाश की एकता या मिलन को देखे।
  • गृहस्थ को सृष्टि स्थिति संहार के पश्चात पुनः सृष्टि स्थिति ध्यान करना चाहिए। यह एक चक्रपूर्ण माना जाता है।
  • सृष्टि है – मस्त से चलते हुए नेत्र-कर्ण-नाक-मुख-हृदय-जठर-जाँघ-पैर
  • संहार है- पैर घुटने-जठर-हृदय-मुख-नाक-कान-नेत्र-मस्तक
  • स्थिति- हृदय-जठर-घुटने-पैर-मस्तक-नैत्र-कर्ण-नाक और मुख।
  • किसी वस्तु पर दृष्टि डालना, धीरे-धीरे वहाँ से लौटाना, तब उस वस्तु के ज्ञान का बोध चित्त के साथ समय करें।
  • किसी मूर्ति या चित्र पर ध्यान करें पैरों के नाखून से धीरे-धीरे देखना आरम्भ करे और फिर धीरे-धीरे ऊपर के अंगो को देखते हुए शिर तक जाए।
  • त्राटक में ध्यान स्थिर किया जाता है परन्तु यहाँ ध्यान स्थिर नहीं, मात्र बोध स्थिर है। चेतना के आवागमन का बोध कराने के लिए यह ध्यान कर सकते है।
  • गूढ आगय या तन्त्र स्वरूप ध्यान का भी एक क्रम बतलाता है। वह क्रम ध्यान करने वाले साधक के सामाजिक व बौद्धिक जीवन चर्या पर निर्भर करता है।
  • विद्यार्थी और सन्यासी को सृष्टि-स्थिति संहार ध्यान करके पुनः सृष्टि ध्यान करना चाहिए।
  • यदि झूम सकते है तो झूमे, नृत्य करें, किसी मुद्रा की आवश्यकता नहीं हे जैसे बहा जाता है वैसे बहे और तीव्रता से करे फिर अचानक रूक जाए निशब्द मौन हो जाए।
  • जहाँ तक शरीर की सार्मथ्य हो वहाँ तक करे, समय बन्धन नहीं है प्रारम्भ में 15 मिनट या 20 मिनट करें।

वकतुम् अर्हसि अशेषेण दिव्याः ह्यात्म विभूतयः।
याभिः विभूतिभिः

  • व्यक्ति शुभ कर्मों का फल चाहता है जो कि अनुकूल परिस्थिति के रूप में सामने आता है उस परिस्थिति में यह सुख मांगता है।
  • जब तक सुख की इच्छा बनी रहती है तब तक वह दुखः से बच नहीं सकता कारण है कि सुख के आदि अन्त में दुख ही रहता है तथा सुख से भी प्रतिक्षण स्वाभाविक वियोग होता रहता है।
  • इस वियोग को व्यक्ति नहीं चाहता पर वियोग तो हो ही जाता है यही नियम है तात्पर्य यह हुआ कि सुख की इच्छा को व्यक्ति नहीं छोड़ता, और दुख व्यक्ति को नहीं छोड़ता।
  • अब दुखों से मुक्ति का क्या उपाय हैै?
  • मौन और प्रेम के एक रस होने का नाम है ध्यान।
  • मानव (व्यक्ति) विषद दुखः से भरे पात्र जैसा हो गया है वह अदभुत अनुभूतियों को पाने के लिए अपने मस्तिष्क को बलपूर्वक उदिग्न कर रहा है, या बलपूर्वक शान्त कर रहा है। दोनों उसकी दोनों चेष्टाएँ निरर्थक है क्योंकि व्यक्ति चाह कर भी ऐसा नहीं कर पाता।
  • लेकिन अगर आप विचार , विचार की खोज विचारों के फैलाव जो भय तथा सुख के रूप में होते है उन विचारों को देखने और समझने लग जाए यह विचारों का निरीक्षण करने लग जाये। उसके कार्य को देखना और समझना।
  • तो आप देखेंगे कि मस्तिष्क प्रघाड़ रूप से शान्त और एक रस का तदात्मय कर लेता है मन की यह विश्रान्ति का बोध ध्यान है।
  • जो हम चाहते है वह होता नहीं और जो होता है वह हमने कभी चाहा नहीं।
  • यह जगत हमारी उगँलियों के इशारे पर नहीं चलता बस यह कसक भीतर को छीले जाती है यह कसक के किसकी मन की।
  • मन कहता है मचल पर होश कहता है संभल।
  • उस होश को चेताने का नाम है ध्यान।
  • बाजार सजे है आपकों खुशियों से भर देने को पर व्यक्ति उदास क्यों है? क्यों बूझा-सा रहता है। सब कुछ पाकर भी लगता है झोली खाली हे एक रिक्तता खालीपन। सुखद अहसास अवसाद और दुख से भरे क्यों है?
  • जिसे हम अमृत समझकर पी रहे है वह जहरीला क्यों लगता है?
  • क्यों लगता है हम गुलाम है अपनी इच्छाओं के कितने सपने संजोये थे जीवन के, पर वे सपने रेत के महल की तरह ढेर हुए।
  • राजाओं की तरह दिखने वाले व्यक्ति गुलाम से क्यों लगते है?
  • कभी किए है यह प्रश्न पर मन बुद्धि की गुणवत्ता ही ऐसे हो जाती है कि व्यक्ति खुशियों की खोज करता हुआ दुख के सागर में डूबने लगता है।
  • इसके विपरीत ध्यान मन की एक ऐसी अवस्था है जिसमें कोई धारणा-कोई सूत्र नहीं होता है बल्कि समग्र अस्तित्व की मुक्ति होती है यह जो सघर्ष विरहित अवस्था है उसी का नाम है ध्यान।
  • कभी विचार करें कि देखे – विचार शब्दों के यप में आते है या विचार चित्र के रूप में आते है।
  • यदि विचार शब्दों के रूप में आते है तो यह मात्र मस्तिष्क की एक क्रिया है पर यदि विचार चित्रों के रूप में आते है तो इसमें मस्तिष्क के साथ सारी इन्द्रियाँ भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है क्योंकि शब्द के बिना विचार को देखना निविचार अवलोकन जगत की विलक्षण घटनाओं में से एक है यह असीम अस्तित्व से होने वाला सम्वाद है।
  • यह ऋषियों को होने वाला अनुभव हे चाहे वेद हो या कुरान यह सुने नहीं गये यह देखे गए। इसी लिए ऋष्ि
  • इनके दृष्टा कहे गये और वेद कहे गये अपौरूषेय।
  • अतः ध्यान का महत्व महानतम है यह असीम और अनन्त की ओर द्वार खोलकर उससे साक्षात्कार कराता है।
  • क्या ऐसे बालक को जानते है जो कभी आपकी खिडकी के शीशे को तोड देता है कभी गमलों से पौधे उखाड दे, कभी गाड़ी के पहियों की हवा निकाल दें।
  • कौन है वो शरारती
  • कौन है वो नटखट अबोध।
  • मित्रों आपका मन है वह नटखट शरारती बालक, उसे दण्ड न दें, उसके साथ शत्रुओं जैसा व्यवहार न करें। जैसे वह आपको सताता है आप भी उसे न सताए।
  • उस सरल अबोध को अपना मित्र बनाए।
  • फिर वह शरारत नहीं करेगा, निभाएगा तो मात्र मित्रता।
  • मित्रों घटना थोडी पुरानी है पर आप सभी उस घटना से परिचित है।
  • युद्ध का समय है दोनों सेनाएँ रणभूमि में आमने-सामने खडी है और एक पक्ष के सेनापति कहते है मेरे अंग शिथिल हो रहे है और मुख सूख रहा है मेरा शरीर कांप रहा है और रोम खडे हो रहे है हाथ से धनुष छूटा जा रहा है मेरी त्वचा चल रही हे मेरा मन भम्रित हो रहा है और मैं खडा रहने में भी असमर्थ हूँ यह कहकर युद्ध से पलापन करना चाहते है?
  • कालचक्र चला व्यक्ति बदल गए, स्थान बदल गए, घटनाएँ बदल गई पर समस्या आज भी यही है।
  • यदि मानव करोडो वर्ष से पृथ्वी पर है तो मानवीय समस्यायें भी करोडो वर्ष से मानव के साथ है।
  • किसी नौकरी के पद के लिए साक्षात्कार देने जाते युवक को ध्यान से देेखे और उसकी मनोदशा का विश्लेषण करे, वह हूबहू उस सेनापति जैसी मनोदशा पायेगे।
  • व्यक्ति में जाति-धर्म-देश की भले ही विभिन्नताएं हो परन्तु समान आयु मे सामान्यतः मनोदशाएं बहुत ही समान होती है।
  • पलायन है क्या?
  • पलायन करना क्यों चाहते है?
  • वस्तुतः मन सब कुछ प्राप्त करना चाहता है परन्तु प्राप्त वस्तु का वास्तविक श्रम कीये बगैर।
  • कृष्ण ने 700 श्लोक कहे जिसमें वह समझाना चाहते हे संसार की वस्तुओं का अस्तित्व होता है परन्तु आत्मा स्वयं अस्तित्व है।
  • वह मौलिक चेतना जो देह में स्थित है जिसे आत्मा कहते हे वह सारे ब्रहमाण्डीय चेतनता का अंश है और उस अंश में वह सभी गुण-स्वभाव उपलब्ध है जो कि उसके मूल स्त्रोत में है आवश्यकता तो मात्र इतनी हे कि वह बोध हो कि जिसके कारण हमारा अस्तित्व है और जिससे हमारा अस्तित्व है उससे सम्वांद कैसे करें।
  • सिद्व कहते है ध्यान मंे बंधा है कषाप। कषाप का तात्पर्य है राग, द्वेष, मोह।
  • राग और मोह मन के आसक्ति बढ़ाने वाले भाव है इन दोनों में गुणात्मक और क्रियात्मक एकता होते हुए भी भेद है। जहाँ राग भाव होता है वहाँ आत्म वस्तु के प्रति तृष्णा होती है तथा मोह को सही ज्ञान के अभाव मे उत्पन्न अज्ञान कहा है मोह अविवेक से उज्जता है इसी प्रकार मोह विवेक के जाग्रत बोध

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