ध्यान

ध्यान 
आधुनिक समाज में व्यस्ततम् व्यक्ति ध्यान क्यों करें ?
कैसे करे ?
और कब करे ? यही जानना चाहता है! ध्यान का उपयोग गया है ?
	क्या ध्यान विचार शून्यता को उपलब्ध कराता है या मात्र एक बौद्धिक कौतूहल
 बनकर रह जाता है।
	अथवा अशान्त मन को शान्त करने का उपाय मात्र है। यह जिज्ञासा प्रत्येक
 साधक के अन्तकरण में उठती है।
	ध्यान का उपयोग विचारो को शान्त करने अथवा अशान्त विचारों का मार्ग
 अवरूद्ध करना ही नहीं है

 जो चित्त को अशान्त करते हैं। ध्यान एक ऐसे थ्पसजमत का कार्य भी करता है जो निरर्थक व निरोद्देश्य विचारों को समाप्त कर,
 उद्देश्यवान और सार्थक अक्षय आनन्द को देने वाले विचारों से साधक के मन को परिपूर्ण कर देता है।
 जिससे ध्यान साधक अपने जीवन में आनन्दित और उत्साहित रहता है।
	ध्यान साधक के उस विधेयात्मक बोध को जाग्रत करता है जो उसे जीवन की गहन जटिलताओं से मिलते हैं। वह बोध रोचक भी
 है और रहस्यमयी भी।
	मन को सुव्यवस्थित करने के अन्य भी तरीके या उपाय हो सकते हैं फिर ध्यान ही क्यों?
  • ऽ मन को ऐसे विचारों से हटा दें जो वतन की ओर ले जाते हो ऽ किसी मन्त्र, वर्ण अथवा अक्षस की लय या धुन प
  • ऽ मन को ऐसे विचारों से भर दें जो मात्र नीति म्जीपबे से प्रेरित हो
  • र मन को स्थिर कर दें
  • यह सभी बातें ठीक हैं पर आंशिक उस मन रूपी कमरे में कचरा भरा है और हम धूप बत्तियाँ जला दें,
दुनिया के महंगे बेशकीमती इत्र छिडक दें।
कितनी देर उनकी खुशबु ठहर पायेगी। बस इसी कारण से यह उपाय इतना ही महत्त्व रखते हैं, इसीलिए
 अधिकांश व्यक्तियों के लिए महत्त्वहीन है, नीरस है और निरर्थक है।
देखने, सुनने और समझने में आने वाला सम्पूर्ण जगत परमात्मा के दिव्य विराट स्वरूप का ही अंग है।
संसार में जो जड़ता, अदिव्यता परिवर्तन दिखाई पड रही है वस्तुतः वह है नहीं,
वासुदेवः सर्वम् यह जगत दिव्य चेतनता से परिपूर्ण है।
यदि भोग दृष्टि है तो संसार दिखेगा। यदि बोध पूर्ण भगवत दृष्टि है तो जगत भगवत स्वरूप ही दिखेगा,
 दिव्य चेतना से परिपूर्ण दिखेगा।
परमात्मा अदभुत है जिसे हमने रेखा नहीं, सुना नहीं, जाना नहीं, समझा नहीं, जो हमारी कल्पना में आया ही
 नहीं उस विराट परमात्मा को जानने की कला ध्यान है।
यह जगत जो रहस्यों से भरा है, उस परम परमात्मा के सौन्दर्य से परिपूर्ण है, उस परमात्मा की सब जगह उपस्थिति है।
 उसकी उपस्थिति के रहस्य को जानो!