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साधना की पूर्व तैयारी Meditation

14 February

साधना की पूर्व तैयारी

  • साधना कैसे स्थान पर धयान करें व कैसे वस्त्र पहनें, भोजन क्या करें, किन-किन का विशेष ध्यान रखे।
  • ध्यान साधक को नियमित अभ्यास के लिए एक एकान्त कक्ष हो। जिसमें हल्के गुलाबी या हल्के नीले रंग का कक्ष हो।
  • शोर गुल से दूर तथा प्रदूषण व विकिरण (त्ंकपंजपवद) फैलाने वाले इलैक्ट्राॅनिक उपकरण न हो।
  • एक मोटा सूती गलीचानुमा आसन हो। जो सफेद या गुलाबी रंग का हो तो बेहतर है।
  • हल्के रंग के ढीले वस्त्र जो ज्यादा कसे हुए न हो तथा सूती या रेशमी हो वह पहने मे प्रयोग कर सकते है।
  • वह भोजन करे जो मन और शरीर को बल प्रदान करें।
  • वह भोजन करें जो शरीर को बल व आनन्द भोजन करने के पश्चात महसूस हो।
  • ज्यादा गरिष्ठ, मिर्च-मसाले व तले-भुने पदार्थ न प्रयोग करे।
  • स्वच्छ ताजा भोजन करें।
  • चुनीदा फलों के रस एवं जल का प्रयोग अधिक करें। क्योंकि जल शरीर का शोधन कर उसे शुद्ध करता है।
  • यदि साधक को ध्यान अवस्था में उष्णता गर्मी का अहसास हो तो सफेद चन्दन का तिलक करें। बेला-चन्दन-चमेली इत्र का तिलक मस्तक पर करे।
  • मक्खन$मिश्री खाने में थोडा प्रयोग में लाए।
  • उपनिषद ऋषियों का वचन है- आहार शुद्वि से प्राणों के सत की शुद्धि होती है, सत्व शुद्धि से स्मृति निर्मल और स्थिर मति प्राप्त (जिसे प्रज्ञा कहते है।) होती है, स्थिर बुद्धि से ेजन्मजमान्तर के बन्धनों और ग्रन्थियों का नाश होता है, बन्धनों और ग्रन्थियों से मुक्ति ही मोक्ष है।
  • अतः आहार शुद्धि प्रथम नियम और प्रतिबद्वता है। आहार केवल मात्र वही नहीं जो मुख से लिया जाए आहार का अभिप्राय है स्थूल शरीर और सूक्ष्म शरीर को पुष्ट और स्वस्थ रखने के लिए इस दुनिया से जो खाद्य लिया जाए।
  • नेत्रांे के लिए आहार है दृश्य या रूप जगत, नाक के लिए आहार है गन्ध, कान के लिए आहार है शब्द, त्वचा के लिए आहार है स्पर्श।
  • कुछ दृश्य सुखद होते है कुछ असुखद, सुखद दश्यों को देखें।
  • कुछ रूचिकारक सुगन्ध है कुछ अरूचिकारक दुर्गन्ध है उन दुर्गन्धों से दूर रहे।
  • कुछ कर्णप्रिय ध्वनि संगीत या बातचीत के रूप में हितकारी है, कुछ ध्वनि शोर मे बदल जाती है उसे तिरस्कृत करें।
  • अतः ज्ञानेन्द्रियों के जो पाँच दोष है जिससे चेतना में विकार पैदा होता है उनसे बचे।

महोदय,

  • साधक को त्याग करने को नहीं कहा जा रहा है, कि तुम्हे सम्पत्ति का त्याग करना होगा।, कि आसक्तियों का त्याग करना होगा, कि कामनाओं का त्याग करना होगा।
  • परन्तु इस साधना के पथ पर तुम्हे किसी चीज का त्याग करने की आवश्यकता पर बल नहीं देना है या कहे-
  • जब तक तुम्हें किसी चीज का त्याग करने की आवश्यकता है तब तक तुम इस पथ पर नहीं आये हो।
  • क्योंकि त्याग करने का अर्थ है कि तुम्हे कोई ऐसी चीज या वस्तु छोड़नी है जिसे तुम मूल्यवान समझते हो।
  • तुम्हें किसी ऐसी चीज को विदाई देनी पड़ती है जिसे तुम रखने योग्य समझते हो पर तुम जिसे प्राणों से अधिक चाह रहे हो वह कुरूप और असत्य दुखः कलेश से पूर्ण है और एक बार जब तुम इसे दुखः रूप में अनुभव करोगे तो समस्त चेतना उत्कंठ रूप में कहेगी।
  • मुझे कोई दूसरी वस्तु चाहिए ऐसी जो सत्य, सुन्दर और शिवमय हो वह ज्ञान आनन्द और चतना से परिपूर्ण हो।
  • तब कुछ त्याग करना न होगा। सत्य चेतना स्वतः प्रकट होकर सार्थक संग चलेगा। और निर्रथक वही पीछे दूर जायेगा।
  • साधना का अर्थ है किसी मन्त्र आसन आदि का बारम्बार अभ्या स करना।
  • तपस्या का अर्थ है- साधना का फल पाने के लिए संकल्प शक्ति को एकाग्र करना।
  • आराधना का अर्थ है- भगवान की पूजा करना, उन्हें प्रेम करना, उनकी अभिप्सा करना।
  • ध्यान का अर्थ है- चेतना का अन्तस में केन्द्रीभूत हेा जाना, बाहय यात्रा को छोडकर, अन्र्तयात्रा का आरम्भ हो जाना।
  • ध्यान साधना का एक समय नियत कर ले और जहाँ तक सम्भव हो, ठीक उसी क्षण या समय पर आरम्भ करे।
  • प्रारम्भ मे कम से कम 15 मिनट तक अभ्यास करें।
  • यदि सम्भव हो तो प्रातः सायं दोनों समय ध्यान करे।
  • जहाँ तक सम्भव हो खाली पेट निराहार ध्यान साधना करे या हल्के तरल पेय पी सकते है।
  • सिद्वों ने रहस्यमयी भाषा को प्रयोग किया है उन्होंने कहा ध्यान का तात्पर्य है डूबना और मात्र डूबना नहीं डूबकर पार हो जाना।
  • गंगा (इडा नाडी) को कहा यमुना (पिंगला नाडी) को कहा गया है और इन दोनों नाडियों के शुद्ध होने के पश्चात साधक जब सुपुम्ना को साध लेता है तो उसे सिद्धो ने सरस्वती कहा हे।
  • गंगाा यमुना में डूबकर ही सरस्वती को साधने का रहस्य बोध, सिद्ध कराते है अर्थात दाई नाक से आने वाले श्वास और बाई नाक से आने वाले श्वास का बोध और उनका नियन्त्रण ही ध्यान में डूबना है सुषुम्ना का जागरण ही डूबकर पार हो जाना है।

¬ तद् विष्णोः परमं सदा पश्यन्ति सूरयः।
दिवीव चक्षुराततम्।।

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