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हंस साधना

14 February

सिद्वों ने शुद्ध चैतन्य की उपमा हंस से दी है आध्यात्मिक उन्नति में शुद्ध प्रबुद्ध चेतना साधना से जैसे-जैसे निखरती है, साधक जीवन में अन्त्रमन की सरलता और सरसता को वैसे ही महसूस करता है। इसी कारण आध्यात्मिक उन्नति के शिखर पर बैठे सिद्व परमहंस कहलाते हे।

हंस साधना

  • सो हं - श्वास को भीतर लेते समय सो का उच्चारण करे।
  • श्वास को बाहर छोड़ते समय हं का उच्चारण करे।
  • यह हंस साधना का तात्पर्य है जो परमात्मा है वह मैं हूँ
  • मैं वही हू यह जगत मेरी कल्पना मात्र है।
  • यह अजपा जाप है यह सिद्वों की रहस्यमय वाणी है कि जाप भी ऐसा जो अजपा है।
  • पंथ बिन चलिबा – जिसमें मार्ग न हो और मंजिल आ जाए।
  • अर्गान बिन जलिबा – आग न हो (दाहकता न हो) ओर जला दे।
  • ग्यान सरीखा गुरू न मिलिया, चिन्तसरीखा चेला, मन सरीखा मेलू न मिलिया, तीर्थ गोरस फिरे अकेला ज्ञान ही महान गुरू है, चित्त महान शिष्य है मन से बडा मित्र कोई नहीं फिर कहाँ तीर्थो के चक्कर लगाते है।

 

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