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हंस साधना

22 August

हंस साधना –

	- सो हं -
	श्वास को भीतर लेते समय सो का उच्चारण करें।
	श्वास को बाहर छोड़ते समय हं का उच्चारण करें।
	यह हंस साधना का तात्पय है, जो परमात्मा है, वह मैं हूँ।
	- मैं वही हूँ यह जगत मेरी कल्पना मात्र है।
	- यह अजपा जाप है। यह सिद्धों की रहस्यमय वाणी है कि जाप भी ऐसा जो अजपा है।
	पथ बिन चलिबा - जिसमें मार्ग न हो और मंजिल आ जाए।
	अगनि बिन जलिबा - आग न हो (दाहकता न हो) और जला दे।
ग्यान सरीखा गुरु न मिलिया, चित्त सरीखा चेला
मन सरीखा मेलू न मिलिया, तीर्थे गोरस फिरे अकेला।
	ज्ञान ही महान गुरु है, चित्त महान शिष्य है, मन से बड़ा मित्र कोई नहीं है,
फिर कहाँ तीर्थों के चक्कर लगाते हो?
	सिद्ध सरह सहजवाद के प्रथम आचार्य हैं, इन्होंने ही सहज यान को सम्प्रदाय के
 धरातल पर उकेरा है, प्रतिष्ठित किया है।
	सिद्धों के अनुसार जीवन की प्रकृतिगत प्रवृत्तियों के साथ ही या बिना उनका त्याग करे
 परमात्मतत्व से साक्षात्कार सम्भव है। कबीर आदि सन्तों ने तो जिस सहज समाधि
 की बार-बार चर्चा की है, उस विचार को उन्होंने सिद्धों से ही लिया है।
	प्रत्येक व्यक्ति पिता और माता के मिलन से बना है, अतः उसमें पुरुषत्व और
 स्त्रीत्व दोनों मिलकर सयरसी भूत हुए हैं।
जह मन पवन न संचरइ, रवि ससि नाह प्रवेश तहि वट चिन्त विसाम करू,
 सरह कहि अ उवेश।
	सिद्ध सरह स्वरहपा कहतें हैं सहजावस्था में मन प्राणों का संचार नहीं होता।
 सूर्य और चन्द्र अर्थात् इडा और पिंगला (गंगा-जमूना) जो कि कालचक्र का ही नामान्तर
 है उन्हें वहां प्रवेश नहीं मिलता, उस वट वृक्ष (सुषुम्ना में) चित्त को स्थिर करें।
 इस अवस्था में मनोलय हो जाता है। इसी कारण यह उन्मनी अवस्था है।
यही शाम्भवी मुद्रा ध्यान है। यही निज स्वरूप है, यही सहज अवस्था है।
	दूसरे दोहे में सिद्ध सरहवा इस स्थिति में होने का महासुख फल बताते हैं।
	घोर, न्यारे चन्द्रमणि, जिमि उज्जो अ करेइ परम महासुख एसुकणे, दुरि अ अशेष हरेई।
	घोर अंधकार को चन्द्रकान्तमणि जिस प्रकार दूर कर अपने निर्मल प्रकाश
से उदभासित होता है उसी प्रकार इस अवस्था में महासुख समस्त दुखों को दूर कर प्रकाशित होता है।

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